चमत्कार होते हैं

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बात २०१६ की है I मैं तब बेंगलुरु में काम करता था I पिछले कुछ समय से मुझे हर जगह हनुमान दादा के दर्शन हो रहे थे I लग रहा था की जैसे वो मुझे बुला रहे थे I अपने जीवन में मैंने कभी भक्ति की ओर ज्यादा ध्यान नहीं दिया I बेंगलुरु में उस समय एक कलाकार की हनुमान जी की कल्पना बहुत प्रचलित हो गयी थी I सब जगह वो ही वो दिख रही थी I काले रंग की पृष्ठभूमि पे सिंदूरी रंग से बनी एक बहुत ही तेजस्वीऔर रूद्र स्वरुप में मारुती की मुखमुद्रा I यही छवि मेरी आँखों के सामने बार बार आ रही थी I

मनुष्य प्राचीन काल से शक्ति में मानता आया है I जिस वस्तु को समझ न पाए वो प्रभु बन गयी I जिस वस्तु से बहुत लाभ मिले वो भी प्रभु I तो कभी बादलों का गरजना शक्ति का स्वरुप बन गया और कभी पेड़ों का हमारा पोषण करना प्रभुत्व की निशानी बन गया I आज विज्ञानं बहुत कुछ समझा सकता है, पर आस्था पर उसका कोई बस नहीं चलता I तो जब मुझे हर जगह बजरंगबली के दर्शन होने लगे, मेरी बुद्धि उसे विज्ञानं द्वारा समझने में जुट गयी I दूसरी और मेरी परवरिश उसे आस्था का बुलावा मानने लगी I वास्तविकता जो भी हो, तय मैंने ये किया की हनुमान जी के मंदिर जाऊंगाI

देवालयों की तरफ मेरा मुख कभी कभार भूले भटके ही मुड़ता है I हर सुबह एक बार आकाश की और देखना, ये ही मेरा उस अंतर्यामी को नमन होता है I और शायद इसीलिए देवालय भी मुझसे कुपित रहते हैं I घर से नौकरी के स्थान के बिच में हनुमान जी का एक छोटा सा मंदिर है I शाम को नौकरी से घर जाते हुए मैंने गाड़ी मंदिर से थोड़ी आगे रोकी I और प्रभु की और बढ़ने लगा I शाम के लगभग ५ एक बज रहे होंगे I मंदिर के सामने पहुँच के देखा की मुख्य द्वार तो बंद था I पास गया I सोचा छोटा द्वार तो खुला होगा, मगर वो भी न हुआ I

‘इतने दिन से मुझे बुला रहे हो और जब मैं आया तो रूठ गए?’ मन ही मन मुस्कुराते हुए मैं घर की और निकल गया I

काम करते करते थोड़ी छुट्टी का मन हो गया था I बीवी और बच्चे दोनों ही हर रोज़ घुमने जाने की दुहाई दे रहे थे I कर्णाटक में यूँ तो देखने तो बहुत कुछ है, पर मेरी धर्मपत्नी और मैं हम्पी जाने का तय कर चुके थे I विजयनगर के खंडहरों में उसकी खोयी हुई ख्याति देखने की तीव्र इच्छा थी I सारी तैयरी के साथ जोशी परिवार गाड़ी लेके निकल पड़ा I चिरंजीवी के दर्शन एक इच्छा बन के रह गए I सोचा, ‘कभी और सही I’

हम्पी पहुँच के कर्णाटक पर्यटन के होटल में ठहर गए सब के सब I कमरा कुछ खास नहीं था I एक ज़माने में पर्यटन विभाग के कमरे सर्वश्रेठ मने जाते थे I अब तो ये भी पुरातत्व विभाग के द्वारा सम्हाले जाने वाले अवशेषों जैसे लगते है I खैर, कमरा साफ़ था और सभी दर्शनीय स्थालो के नज़दीक I अन्दर सामान रख के हम घुमने निकल गए I शाम को जब लौटे तो कमरे में एक पर्चा रखा हुआ था I हम्पी और उसके करीब के स्थलों की जानकारियों से भरा हुआ पर्चा I

पढ़ते पढ़ते मेरी नज़र पर्चे के एक कोने में आके रुक गयी  I आखों में विस्मय था I हम्पी के काफी स्थल रामायण से जुड़े हुए थे I सुग्रीव की गुफा थी, और वो मंदिर भी था जहाँ राम ने सुग्रीव का राज्याभिषेक किया था I पर मैं इन बातों से दंग नहीं था I मेरी आखें तो ‘अन्जनेया पर्वत’ शब्दों पे स्थिर हो गयी थी I हम्पी से पौने घंटे की दुरी पर अन्जनेया पर्वत है जो की हनुमान जी की जन्मस्थली माना जाता है I आपको अवगत करा दूं की हनुमान जी को अंजनी पुत्र भी कहा जाता है  I मेरे लिए हम्पी सिर्फ विजयनगर साम्राज्य था, अब वो किश्गिन्धा बन गया I मैंने हस के भाग्यवान को बताया तो वो भी आश्चर्य चकित हो उठी I बाकि कार्यक्रम बाजु में रखके हमने तय किया की अगली सवेरे ही पर्वत पर चढ़ेंगे I

प्रातः काल जल्दी जल्दी नित्य कर्म करके हब सब निकल पड़े I हम्पी तुंगभद्रा के दक्षिण में और पर्वत उत्तर में I गाड़ी के जाने लायक पुल १५ की. मी., गंतव्य तक पहुँचने के लिए ३५ की. मी. I अजीब बात ये है की अगर नाव से नदी पर करो तो दुरी सिर्फ २ की. मी. की है I कर्णाटक में बहुत सारे पर्वत हैं, और लगभग उन सभी पे कोई न कोई देवालय है I बड़ी बड़ी चट्टानों से बने ये पर्वत बड़े रमणीय लगते है I दूर से अगर अन्जनेया पर्वत को देखा जाये तो ऐसा प्रतीत होगा की जैसे एक बड़ी चट्टान को धरती पे रखके किसी दैवीय शक्ति ने एक बहुत ही बड़ी तलवार से उसके जिस्म पे बहुत सारे घाव झिंक दिए I उन घावो में वक़्त के साथ साथ पेड़ पौधों ने अपना घर कर लिया I भूरे रंग के पत्थर में हरे रंग की लकीरें दिखती है I

हम लोग ७ बजे पर्वत के तले पे पहुँच गए I मैंने मुहं ऊपर की और किया और बोला,

‘रोज़ तो आकाश में तुम्हे ढूंढता हु, आज तुमसे मिलने वही आ रहा हूँ I’

कभी किसी छोटी बच्ची के हाथ में स्लेट और चाक दिया है? जिस प्रकार वो उस स्लेट पे सफ़ेद आड़ी टेढ़ी लकीरें खींच देती है, पर्वत और उसमे बनी चुने में लिपटी सीढियां भी कुछ ऐसा ही दृश्य पैदा कर रही थी I अद्भुत I सीढ़ी पर्वत के शिखर पे बने हनुमान जी के मंदिर तक पहुँचती थी I चढ़ाई प्रारंभ की, और बीच बीच में रुक के फोटो भी खींचत रहे I पता ही नहीं चला की कब ऊपर पहुँच गये I सीढियां जहा ख़त्म हुई, वही लोगों ने जूते रखे हुए थे I मैं भी बैठ गया और जूते उतारने लगा I दूसरा मोजा जब उतरा ही था की सुबह की आरती शुरू हो गयी I बीवी हसी और बोली, ‘लो तुम्हारी ही राह देख रहे थे I’ दर्शन किये और मन को थोड़ी शांति मिली I बहुत दिनों से बुलावा आया था, अब शायद मेरा मन सतोष का अनुभव करेगा I तत पश्चात् , हम सब ऊपर ही थोडा टहलने लगे I

ऐसा सुन्दर नज़ारा तो मुंबई नगरी की समुन्दर किनारे वाली बहु मंजिला इमारतों की छतों से भी नहीं मिलता I पर्वत ऊपर से सपाट था I कुछ पेड़ पौधे थे I एक ओर छोटा सा सफ़ेद मंदिर था I चारो तरफ लाल और हरे में लिपटी धरती थी I ऊपर नीला आसमान था I मैंने अपनी नज़र नीचे की तरफ मोड़ी I अगर सीढियां न होती तो इस पर्वत पे चड़ना मेरे जैसे कुर्सी के पहलवान के लिए नामुमकिन होता I पर्वत का आकार ही कुछ यूं था की क्या कहने I चारो ओर से सीधी पथरीली दीवार थी I ढलान का कही नामोनिशान नहीं था I देखते देखते मुझे तानाजी मलुसुरे, यशवंती गोह, और सिंहगड की याद आ गयी I

कुछ देर पकृति के साथ रहके हम सब ने फिर नीचे जाने का मन बनाया I हम सबने फिर से जूते पहन लिए I वही पास में पत्थर पे दो छोटे वानर खेल रहे थे I क्या? मैंने आपको नहीं बताया? अरे भाई, ये अन्जनेया पर्वत है, हनुमान जी की जन्मस्थली I राम की वानर सेना के सेनापति थे वो I तो वानरों का यहाँ होना तो स्वाभाविक है I अचरज मत करिए, यहाँ पे असंख्य वानर है I

फिर चलते हैं उन दोनों छोटे उधामखोर वानरो की ओर I उनकी क्रीड़ाभूमि सपाट पत्थर की थी I पर वो उसके मध्य में नहीं, उसकी धार पे खेल रहे थे I ‘बेटा, आज पानी में मत खेलना I’ कभी बोल के तो देखिये अपने नन्हे मुन्हे को I मासूम चेहरे और चंचल मुस्कान के साथ बोलेगा, ‘ठीक है पापा I’ पर जैसे ही घर के बहार निकलेगा, सीधा पानी में कूदेगा I ये दोनों भी शायद वोही कर रहे थे I उनकी माँ थोड़ी दूर बैठी थी और पिताजी आराम से नीले आसमान के नीचे शवासन का अभ्यास कर रहे थे I ना, ना, मैं पुरुष जाती पे कोई टिपण्णी नहीं कर रहा I पर आप ही बताइए, क्या हर घर में एक ऐसा सोफ़ा नहीं होता है, जिसपे हम पुरुष प्रजाति के लोग पीठ टिकाते टिकाते पुरे ही टिक जाते है ?

खेल में डूबे नन्हे वानरों को अपने अगल बगल का ज़रा भी ख्याल ना था I वो चट्टान की धार के ऊपर ही खेल रहे थे I अगर पाँव जरा सा फिसला तो गए सीधा नीचे I ढलान नहीं थी, सीधी खाई थी I और नीचे भी धरती का कोमल आँचल नहीं, पत्थर था I कितना नीचे गिरते, ये भांपना मुश्किल था I पेड़ और उनकी टहनियों की वजह से ज़मीन नहीं दिख रही थी I मैं पत्नी को बोलने ही वाला था की तभी एक छोटे वाले ने अपने भाई को खेल खेल में धक्का दिया  I मैं और बीवी स्तभ्ध रह गए  I उसने मेरा और बच्चो का हाथ अनायास ही थाम लिया  I छोटा वानर किनारे से फिसल गया  I उसके नन्हे हाथो ने पत्थर पे नोचते हुए खुदको बचाने का प्रयत्न किया  I पत्थर की चिकनी सतह पर उसका हाथ पकड़ नहीं बना पाया और वो एक पल में ही हमारी नज़रो से ओज़ल हो गया  I

धक्का मारने वाला बच्चा सहम गया  I उसने दो कदम पीछे लिए I गुस्से, डर, और शर्म से उसका मुह सिकुड़ गया  I उसकी माँ दोनों को खेलते देख रही थी  I वो पलक झपकते उठी और अपने डरे हुए लाडले के पास दौड़ी  I उसके पास पहुँचके उसने जो किया, वोह हम आज तक नहीं भूले  I माँ ने बच्चे को अपनी छाती से लगा लिया और कस के पकड़ लिया  I दूर खड़े हम पति पत्नी उस माँ की आखे तो नहीं देख पा रहे थे, पर उसकी प्रतिक्रिया ने सब बिन कहे बता दिया  I एक तरफ उसका दिल उस गिरने वाले बच्चे के लिए रो रहा था, और दूसरी तरफ उसकी ममता गिराने वाले बच्चे को गले लगा रही थी  I मैंने आजतक ऐसा आत्मा को झकझोड़ने वाला द्रश्य कभी नहीं देखा  I

इस सब झमेले में पिता चुप चाप नहीं बैठा था  I उसकी प्रतिक्रिया माँ से धीमी थी, पर वो तुरंत उठा और किनारे की ओर गया  I थोड़ी देर उम्मीद से नीचे देखता रहा  I मेरा दिल बैठ गया था  I पत्नी के चेहरे पे भी कोई उम्मीद नहीं दिख रही थी  I पर तभी टहनियों के बीच में से एक वानर के चिल्लाने की आवाज़ सुनाई दी  I वो जोर जोर से टहनियों को हिला हिला के चिल्ला रहा था  I वो बच गया ! हम दोनों ने एक साथ गहरी सांस ली  I छोटू ने पत्थर तो नहीं, पर टहनियों को सफलता से पकड़ लिया था  I अब वो भयंकर गुस्से में अपने भाई को अपशब्द कह रहा था  I

माँ ने अभी तक दुसरे छोटू को नहीं छोड़ा था, पर पिता फिर अपने काम पे लग गए  I धीमे धीमे अपनी चट्टानी शैया के पास गए और फिर से सो गए  I हम सब वापस चल दिए  I हम्पी की यात्रा अच्छी थी, पर जो मानवता का स्वरुप अन्जनेया पर्वत पे देखा वो हमारे दिल पे अपनी छाप छोड़ गया  I ये बात और है की ये ममता और मानवता हमे किसी मानव से सीखने को नहीं मिली  I आज भी जब बच्चे खेलते खेलते एक दुसरे को चोट लगाके शिकायत करने आते हैं, मुझे वो सहमा वानर, उसकी माँ, और उसका चिल्लाता हुआ भाई याद आ जाते है  I मैं जब अपने एक बच्चे को दुसरे को चोट पहुँचाने के लिए डांट मरता हूँ, तो भूल जाता हूँ की है तो दोनों बच्चे ही  I खेलते खेलते तो चोट लगती ही है, कोई इरादे से तो नहीं लगाता  I मनुष्य अपनी समझ पे बहुत इतराता है, पर शायद उसे अभी बहुत कुछ सीखना बाकि है  I

खैर, हनुमान जी अब मुझे नहीं बुलाते, हम दोनों फिर से सुबह एक बार मिल लेते हैं  I कभी कभी ऐसी घटना घट जाती है, जो चमत्कार से कम नहीं लगती  I उनका मुझे यूँ अपनी जन्मस्थल पे बुलाना चमत्कार था, या उस वानर माँ का अपने बच्चे को गले लगाना, ये तय करना मैं आप लोगो पे छोड़ता हूँ  I मेरी कथा काल्पनिक लगती जरूर है, पर है नहीं I

जय राम जी की  I

प. भा: चित्र मैंने अन्जनेया पर्वत के ऊपर से खींचा है I ध्यान से देखे तो तुंगभद्रा भी दिखेगी I

6 thoughts on “चमत्कार होते हैं

  1. बहुत रसप्रद किस्सा है. तुम्हारी लेखनशैली ने उसे जिवंत किया है।
    शुभकामनाएं

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